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Friday, October 25, 2013

हिन्दी साहित्य की बनावटी भाषा



-महावीर सांगलीकर

हिन्दी फिल्मों, हिन्दी टी.वी. के प्रोग्राम आदि आम आदमी की समझ में झट से आते है,  क्यों कि इनमें आम आदमी जो भाषा बोलता है वही हिन्दी बोली जाती है. इसके उल्टे हिन्दी साहित्य की भाषा इतनी जटिल होती है कि क्या बतायें. हिन्दी साहित्य में हिन्दी कम और संस्कृत ज्यादा होती है ऐसा कहना गलत न होगा.

जटिल भाषा में लिखनेवाले हिन्दी लेखकों को यह जानना चाहिए कि आज देश-विदेशों में करोडो अहिन्दी भाषी लोग हिन्दी बोलना सीख गए हैं, वह हिन्दी साहित्य के कारण नहीं बल्कि हिन्दी फिल्मों और टी.वी. के कारण है.

हिन्दी लेखकों को चाहिए की वे बनावटी और जटिल शब्दों का उपयोग करना बंद कर दें, और बोलचाल की भाषा में लिखना सीखे. माना की बोलचाल की भाषा और साहित्य की भाषा में फर्क होता है, लेकिन वह इतना नहीं होना चाहिए जितना बोलचाल की हिन्दी और साहित्य की हिन्दी में होता है. दूसरी भारतीय भाषाओं का साहित्य बोलचाल की भाषा से इतना दूर नहीं जितना कि हिन्दी का साहित्य होता है.

कभी आपने सुना है कि हिन्दी बोलते समय लोग एवं, प्रथम, द्वितीय,किन्तु-परन्तु जैसे शब्द बोलते हो? वह तो और, पहला, दूसरा, लेकिन जैसे शब्द ही बोलते है. फिर हिन्दी साहित्य में एवं, प्रथम, द्वितीय, किन्तु-परन्तु, अपितु जैसे शब्दों का उपयोग क्या जरूरी है?

हिन्दी साहित्य पर संस्कृत भाषा हावी हो गयी है,  और इसी कारण हिन्दी साहित्य संस्कृत की तरह आम लोगों से और बोलचाल की भाषा से दूर जा रहा है.

हिन्दी भाषा को अंगरेजी या किसी दूसरी भाषा से कोई खतरा नहीं है. उल्टे भारतीय अंगरेजी पर हिन्दी भाषा हावी होती जा रही है. हिन्दी को खतरा है तो केवल हिन्दी साहित्य की बनावटी भाषा से है. ऐसी बनावटी हिन्दी जितनी जल्द मर जाए, हिन्दी भाषा के लिए उतना अच्छा ही है.